15 अगस्त रात 10:30 बजे गई बिजली, 16 अगस्त शाम 7 बजे लौटी; तीन घंटे 42 मिनट बाद 100 KVA ट्रांसफॉर्मर फिर तेज धमाके के साथ फेल, 17 अगस्त को खबर लिखे जाने तक अंधेरे में इलाका
लखनऊ। चिनहट क्षेत्र के लौलाई विद्युत उपकेंद्र की बिजली व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। 15 अगस्त की रात करीब 10:30 बजे गई बिजली करीब 20 घंटे 30 मिनट बाद 16 अगस्त शाम लगभग 7 बजे बहाल हो सकी। उपभोक्ताओं ने राहत की सांस ली ही थी कि महज तीन घंटे 42 मिनट बाद रात 10:42 बजे 100 KVA का ट्रांसफॉर्मर तेज आवाज के साथ फिर फेल हो गया। इसके बाद इलाके में दोबारा अंधेरा छा गया।
खबर लिखे जाने तक न तो नया ट्रांसफॉर्मर पहुंचा है और न ही बिजली आपूर्ति बहाल हुई है। वहीं, स्थानीय उपभोक्ताओं के मुताबिक जिम्मेदार JE का CUG नंबर एक बार फिर बंद है।
यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ बिजली कटौती का मामला नहीं है, बल्कि फॉल्ट की पहचान, तकनीकी कार्रवाई, स्टाफ की उपलब्धता और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
रात 2 बजे कहा गया ‘ट्रांसफॉर्मर जल गया’
15 अगस्त की रात करीब 10:30 बजे लौलाई में बिजली चली गई। स्थानीय लोगों के मुताबिक उपकेंद्र को तत्काल सूचना दी गई, लेकिन घंटों तक समस्या का समाधान नहीं हुआ।
रात करीब 2 बजे कई उपभोक्ता परेशान होकर उपकेंद्र पहुंचे। वहां मौजूद स्टाफ की ओर से बताया गया कि ट्रांसफॉर्मर जल गया है और नया ट्रांसफॉर्मर मंगाया जाएगा।
लेकिन बाद में सामने आया कि ट्रांसफॉर्मर जला नहीं था, बल्कि खराब हुआ था।
यहीं से बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर पहला बड़ा सवाल खड़ा होता है यदि ट्रांसफॉर्मर जला ही नहीं था तो रात 2 बजे उपभोक्ताओं को ‘ट्रांसफॉर्मर जल गया’ की जानकारी किस आधार पर दी गई?
और उससे भी बड़ा सवाल यह कि क्या मौके पर तकनीकी जांच किए बिना ही ट्रांसफॉर्मर को खराब घोषित कर दिया गया था?
बाहर से बुलाए गए तकनीकी लोगों ने भी खड़े कर दिए हाथ
बाद में खराब ट्रांसफॉर्मर को ठीक करने के लिए बाहर से तकनीकी लोगों को बुलाया गया।
जानकारी के मुताबिक इन लोगों ने करीब दो घंटे तक ट्रांसफॉर्मर को ठीक करने का प्रयास किया। लेकिन जब उसे दोबारा चालू करने की कोशिश की गई तो ट्रांसफॉर्मर से फिर जोरदार आवाज आई।
इसके बाद उसे ठीक करने आए लोगों ने भी हाथ खड़े कर दिए।
यानी जिस ट्रांसफॉर्मर के बारे में रात में उपभोक्ताओं को “जल गया” बताया जा रहा था, उसे ठीक करने के लिए तकनीकी टीम बुलानी पड़ी और करीब दो घंटे के प्रयास के बाद भी उसे चालू नहीं किया जा सका।
शाम 5 बजे लगाया गया पुराना रिपेयर किया हुआ ट्रांसफॉर्मर
नया ट्रांसफॉर्मर उपलब्ध कराने के बजाय करीब शाम 5 बजे पुराना रिपेयर किया हुआ 100 KVA ट्रांसफॉर्मर लाकर लगाया गया।
इसके बाद करीब शाम 7 बजे बिजली आपूर्ति बहाल हुई।
करीब 20 घंटे 30 मिनट तक बिजली के लिए परेशान रहे उपभोक्ताओं के लिए यह राहत की खबर थी।
लेकिन यह राहत ज्यादा देर नहीं टिक सकी।
सिर्फ 3 घंटे 42 मिनट चली बिजली, फिर तेज धमाके के साथ ट्रांसफॉर्मर फेल
16 अगस्त की रात करीब 10:42 बजे वही 100 KVA का रिपेयर किया हुआ ट्रांसफॉर्मर एक बार फिर जोरदार आवाज के साथ फेल हो गया।
इसके बाद इलाके में फिर बिजली गुल हो गई।
यानी जिस पुराने रिपेयर किए गए ट्रांसफॉर्मर को लगाकर शाम 7 बजे बिजली बहाल की गई थी, वह महज तीन घंटे 42 मिनट ही चल सका।
अब सवाल यह है कि
क्या उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए जानबूझकर एक पुराने रिपेयर किए गए ट्रांसफॉर्मर पर निर्भर किया गया?
क्या विभाग के पास तत्काल लगाने के लिए नया 100 KVA ट्रांसफॉर्मर उपलब्ध नहीं था?
और यदि नया ट्रांसफॉर्मर उपलब्ध नहीं था तो उपभोक्ताओं को इसकी स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं दी गई?
₹1 करोड़ की क्षमता वृद्धि, फिर भी स्थानीय फॉल्ट का कोई स्थायी समाधान नहीं
जून 2026 में लौलाई उपकेंद्र की क्षमता बढ़ाने के लिए करीब ₹1 करोड़ की लागत से 5 MVA का नया पावर ट्रांसफॉर्मर लगाया गया था। उस समय विभाग की ओर से बताया गया था कि इससे करीब 12 हजार परिवारों और बाजार को ओवरलोडिंग से राहत मिलेगी।
लेकिन यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ₹1 करोड़ की लागत वाला 5 MVA ट्रांसफॉर्मर और 15–16 अगस्त को खराब हुआ 100 KVA वितरण ट्रांसफॉर्मर अलग हैं।
फिर भी सवाल अपनी जगह कायम है, जब उपकेंद्र की क्षमता बढ़ाने पर इतना बड़ा निवेश किया गया है, तो स्थानीय वितरण व्यवस्था में एक ट्रांसफॉर्मर खराब होने के बाद उपभोक्ताओं को 20 घंटे से ज्यादा और फिर दोबारा घंटों बिजली से वंचित क्यों रहना पड़ रहा है?
12 हजार परिवारों का भार, चार कर्मचारियों के भरोसे व्यवस्था?
स्थानीय लोगों का दावा है कि इतने बड़े क्षेत्र की बिजली व्यवस्था के लिए उपकेंद्र पर महज चार कर्मचारी उपलब्ध हैं।
अगर यह स्थिति सही है तो यह अपने आप में बड़ा प्रशासनिक सवाल है।
करीब 12 हजार परिवारों और बड़े क्षेत्र को बिजली देने वाले उपकेंद्र में
कितने पद स्वीकृत हैं?
कितने कर्मचारी तैनात हैं?
रात की शिफ्ट में कितने कर्मचारी रहते हैं?
लाइनमैन कितने हैं?
और फॉल्ट आने पर मौके पर पहुंचने की जिम्मेदारी किसकी है?
इन सवालों का जवाब बिजली विभाग को सार्वजनिक करना चाहिए।
JE का CUG फिर बंद: मुसीबत में उपभोक्ता जाएं तो जाएं कहां?
इस पूरे घटनाक्रम में JE की जवाबदेही सबसे अहम सवालों में से एक है।
स्थानीय स्तर पर की गई पड़ताल के दौरान JE का CUG नंबर बंद मिला। यही स्थिति अब दोबारा बिजली जाने के बाद भी बनी हुई है।
जब क्षेत्र में दोबारा बिजली गुल है, नया ट्रांसफॉर्मर नहीं आया है और उपभोक्ता परेशान हैं, ऐसे समय में जिम्मेदार अधिकारी का CUG बंद मिलना बेहद गंभीर सवाल खड़ा करता है।
क्या बिजली विभाग के JE का CUG नंबर आपात स्थिति में भी बंद रहेगा?
यदि उपभोक्ता रात में बिजली फॉल्ट की सूचना देने के लिए JE से संपर्क ही नहीं कर सकते तो जवाबदेही आखिर किसकी है?
CUG नंबर सुविधा है या सिर्फ कागजों पर दर्ज एक संपर्क नंबर?
‘अभी लाइनमैन भेज रहे हैं’ रातभर यही चलता रहा
स्थानीय उपभोक्ताओं के अनुसार 15 अगस्त की रात बिजली जाने के बाद उन्होंने तत्काल उपकेंद्र को सूचना दी।
इसके बाद उन्हें कथित तौर पर बार-बार यही जवाब मिलता रहा-
“अभी लाइनमैन भेज रहे हैं।”
लेकिन रात गुजरती रही।
लाइनमैन के पहुंचने का इंतजार होता रहा।
और जब उपभोक्ता खुद रात करीब 2 बजे उपकेंद्र पहुंचे तो उन्हें “ट्रांसफॉर्मर जल गया” बताया गया।
बाद की घटनाओं ने इस दावे पर भी सवाल खड़े कर दिए, क्योंकि ट्रांसफॉर्मर को बाद में तकनीकी लोगों ने ठीक करने का प्रयास किया।
पहले भी भड़क चुका है उपभोक्ताओं का गुस्सा
लौलाई उपकेंद्र की कार्यप्रणाली को लेकर विवाद नया नहीं है।
अप्रैल 2026 में कांशीराम कॉलोनी समेत आसपास के लोगों ने बिजली संबंधी समस्याओं को लेकर उपकेंद्र का करीब नौ घंटे तक घेराव किया था। जून में बिजली कटौती को लेकर हालात और बिगड़े और उपकेंद्र में तोड़फोड़ तथा कर्मचारियों के साथ मारपीट की घटना सामने आई। इसके बाद 100 अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी।
ऐसे में सवाल यह है कि लगातार विवादों के बावजूद क्या विभाग ने अपनी फॉल्ट रिस्पॉन्स और उपभोक्ता शिकायत व्यवस्था में कोई ठोस सुधार किया?
15 और 16 अगस्त की घटनाएं तो कम से कम ऐसा संकेत नहीं देतीं।
अब सबसे बड़ा सवाल—नया ट्रांसफॉर्मर कब आएगा?
16 अगस्त रात 10:42 बजे 100 KVA ट्रांसफॉर्मर के दोबारा फेल होने के बाद खबर लिखे जाने तक नया ट्रांसफॉर्मर नहीं लगाया गया था और बिजली आपूर्ति बहाल नहीं हुई थी।
उपभोक्ता अब जानना चाहते हैं:
नया ट्रांसफॉर्मर कब आएगा?
बिजली कब बहाल होगी?
खराब ट्रांसफॉर्मर की तकनीकी जांच कौन करेगा?
रात 2 बजे ‘ट्रांसफॉर्मर जल गया’ बताने वाले कर्मचारी के पास उस समय कौन-सी तकनीकी जानकारी थी?
और सबसे अहम,
क्या इस पूरे मामले में किसी अधिकारी की जवाबदेही तय होगी?
लौलाई की कहानी अब सिर्फ बिजली कटौती की कहानी नहीं है।
यह सवाल है कि एक बड़े विद्युत उपकेंद्र की व्यवस्था आखिर कितनी जिम्मेदारी से संचालित हो रही है।
एक तरफ विभाग करोड़ों रुपये खर्च कर क्षमता बढ़ाने की बात करता है, दूसरी तरफ एक 100 KVA ट्रांसफॉर्मर के खराब होने पर उपभोक्ताओं को पहले 20 घंटे 30 मिनट इंतजार करना पड़ता है, फिर पुराने रिपेयर किए हुए ट्रांसफॉर्मर के सहारे बिजली बहाल होती है और महज 3 घंटे 42 मिनट बाद वही व्यवस्था फिर ध्वस्त हो जाती है।
ऊपर से JE का CUG बंद।
अगर यह व्यवस्था है तो सवाल जायज है—
बिजली का फॉल्ट ठीक करने में दिक्कत है या फिर व्यवस्था की जिम्मेदारी तय करने में?
लौलाई के उपभोक्ताओं को अब आश्वासन नहीं, जवाब चाहिए।
ek pahel ek pahel